जीवन की सबसे प्रारंभिक यादों में शायद यही यादें हैं जिन्हें मन ने संजों कर रखा है । आज भी याद है मंतु लाला हमारे मकान मालिक और उनका वो बेटा जो गुस्सा होने पर ख़ुद को ही पीटता था । उनका वो सीमेंट का गोदाम जिसमे छिप कर हम लोग आइस पाइस खेला करते थे । दो कमरे , एक रसोईं और बीच का वो आँगन जिसमे मम्मी की सूखने को डाली गयी साडी हमने जमादारिन को दे डाली थी । और उसके बाद का नज़ारा तो भूलना ही मुश्किल है माताजी की डांट , सच क्या मीठे दिन थे वो । और उन दिनों में एक बार जब सामने रहने वाले बच्चों से जब हम गाली सीख आए थे और पापा के उपर ही आजमाँ डाली थी तो कितना पिटे थे । पापा की वो पहली और आखिरी मार थी पर आज भी उनकी उँगलियों के निशान गाल पर महसूस होते हैं । वो घर के पास वाला पार्क जिसमे बीच में एक फ़वारा हुआ करता था । वो स्कूल जिसके प्रिंसिपल से डर कर हम लोग अपने रुमाल से जूते पोछा करते थे । वो दिन लौट तो नही सकते पर हाँ उनकी यादों को संजों कर रखा जा सकता है।
सही ही है: " ये दौलत भी ले लो , ये शौहरत भी ले लो ,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी,
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज़ की कश्ती , वो बारिश का पानी । "
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