bachpan ki yadein

meri kahani

Thursday, October 2, 2008

उन्नाव में बीते दिन

जीवन की सबसे प्रारंभिक यादों में शायद यही यादें हैं जिन्हें मन ने संजों कर रखा हैआज भी याद है मंतु लाला हमारे मकान मालिक और उनका वो बेटा जो गुस्सा होने पर ख़ुद को ही पीटता थाउनका वो सीमेंट का गोदाम जिसमे छिप कर हम लोग आइस पाइस खेला करते थेदो कमरे , एक रसोईं और बीच का वो आँगन जिसमे मम्मी की सूखने को डाली गयी साडी हमने जमादारिन को दे डाली थीऔर उसके बाद का नज़ारा तो भूलना ही मुश्किल है माताजी की डांट , सच क्या मीठे दिन थे वोऔर उन दिनों में एक बार जब सामने रहने वाले बच्चों से जब हम गाली सीख आए थे और पापा के उपर ही आजमाँ डाली थी तो कितना पिटे थेपापा की वो पहली और आखिरी मार थी पर आज भी उनकी उँगलियों के निशान गाल पर महसूस होते हैंवो घर के पास वाला पार्क जिसमे बीच में एक फ़वारा हुआ करता थावो स्कूल जिसके प्रिंसिपल से डर कर हम लोग अपने रुमाल से जूते पोछा करते थेवो दिन लौट तो नही सकते पर हाँ उनकी यादों को संजों कर रखा जा सकता है

सही ही है: " ये दौलत भी ले लो , ये शौहरत भी ले लो ,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी,
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज़ की कश्ती , वो बारिश का पानी । "

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