जितने छोटे थे हम उतने ही बड़े हमारे सपने थे . ये भी करना है वो भी करना है ,जाने कितने ही ख्वाबों के बीच घिरे रहते थे । वो बचपन और स्कूल के दिन, जब अपने वजन से भारी बस्ता उठाने पर भी हमारे कदम आकाश पर ही पड़ते थे , और अपनी धुन में गम हम जाने कब स्कूल से घर आ जाते थे । शैतानियाँ और माँ की दांत दोनों ही बड़ी प्यारी लगा करती थी और दोनों का सुख भी एक साथ ही मिल जाता था इसलिए हम शैतानियाँ करने से बाज नही आते थे । सरस्वती शिशु मन्दिर के वो दिन जब प्रांगन में हम लक्ष्मी वाहिनी की सफ़ेद दरी पहने , हम स्वयं को रानी लक्ष्मी से कम नही समझते थे । एक प्ले हुआ था स्कूल में जिसमे हमें लाक्स्मन का अभिनय करना था पर हमारे हिस्से में कोई दिलोगुए नही था ,बुरा तो लगा था पर हम इसी में खुश थे क्योंकि पहली बार स्टेज पर जाना था । हमारा प्लाय्बहुत अच्छा हुआ था , सभी बार बार आकर राम और सीता को "very good" बोल रहे थे ,और सच कहूं तो मुझे दुःख हो रहा था .........मैं बहुत रोई थी , आज भी मन करता है की वो चांस दुबारा मिल जाए और वो राम का पार्ट हमें मिल जाए .........हाँ शायद ये मेरा बचपना ही है जो आज भी कहीं मेरी भावनाओ में मेरे साथ है पर वो पहली बार ही था जब हमने हार और जीत का फर्क महसूस किया था ।
bachpan ki yadein
meri kahani
Tuesday, October 7, 2008
पहली बार
Thursday, October 2, 2008
उन्नाव में बीते दिन
जीवन की सबसे प्रारंभिक यादों में शायद यही यादें हैं जिन्हें मन ने संजों कर रखा है । आज भी याद है मंतु लाला हमारे मकान मालिक और उनका वो बेटा जो गुस्सा होने पर ख़ुद को ही पीटता था । उनका वो सीमेंट का गोदाम जिसमे छिप कर हम लोग आइस पाइस खेला करते थे । दो कमरे , एक रसोईं और बीच का वो आँगन जिसमे मम्मी की सूखने को डाली गयी साडी हमने जमादारिन को दे डाली थी । और उसके बाद का नज़ारा तो भूलना ही मुश्किल है माताजी की डांट , सच क्या मीठे दिन थे वो । और उन दिनों में एक बार जब सामने रहने वाले बच्चों से जब हम गाली सीख आए थे और पापा के उपर ही आजमाँ डाली थी तो कितना पिटे थे । पापा की वो पहली और आखिरी मार थी पर आज भी उनकी उँगलियों के निशान गाल पर महसूस होते हैं । वो घर के पास वाला पार्क जिसमे बीच में एक फ़वारा हुआ करता था । वो स्कूल जिसके प्रिंसिपल से डर कर हम लोग अपने रुमाल से जूते पोछा करते थे । वो दिन लौट तो नही सकते पर हाँ उनकी यादों को संजों कर रखा जा सकता है।
सही ही है: " ये दौलत भी ले लो , ये शौहरत भी ले लो ,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी,
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज़ की कश्ती , वो बारिश का पानी । "
सही ही है: " ये दौलत भी ले लो , ये शौहरत भी ले लो ,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी,
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज़ की कश्ती , वो बारिश का पानी । "
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