bachpan ki yadein

meri kahani

Tuesday, October 7, 2008

पहली बार

जितने छोटे थे हम उतने ही बड़े हमारे सपने थे . ये भी करना है वो भी करना है ,जाने कितने ही ख्वाबों के बीच घिरे रहते थे । वो बचपन और स्कूल के दिन, जब अपने वजन से भारी बस्ता उठाने पर भी हमारे कदम आकाश पर ही पड़ते थे , और अपनी धुन में गम हम जाने कब स्कूल से घर आ जाते थे । शैतानियाँ और माँ की दांत दोनों ही बड़ी प्यारी लगा करती थी और दोनों का सुख भी एक साथ ही मिल जाता था इसलिए हम शैतानियाँ करने से बाज नही आते थे । सरस्वती शिशु मन्दिर के वो दिन जब प्रांगन में हम लक्ष्मी वाहिनी की सफ़ेद दरी पहने , हम स्वयं को रानी लक्ष्मी से कम नही समझते थे । एक प्ले हुआ था स्कूल में जिसमे हमें लाक्स्मन का अभिनय करना था पर हमारे हिस्से में कोई दिलोगुए नही था ,बुरा तो लगा था पर हम इसी में खुश थे क्योंकि पहली बार स्टेज पर जाना था । हमारा प्लाय्बहुत अच्छा हुआ था , सभी बार बार आकर राम और सीता को "very good" बोल रहे थे ,और सच कहूं तो मुझे दुःख हो रहा था .........मैं बहुत रोई थी , आज भी मन करता है की वो चांस दुबारा मिल जाए और वो राम का पार्ट हमें मिल जाए .........हाँ शायद ये मेरा बचपना ही है जो आज भी कहीं मेरी भावनाओ में मेरे साथ है पर वो पहली बार ही था जब हमने हार और जीत का फर्क महसूस किया था ।

Thursday, October 2, 2008

उन्नाव में बीते दिन

जीवन की सबसे प्रारंभिक यादों में शायद यही यादें हैं जिन्हें मन ने संजों कर रखा हैआज भी याद है मंतु लाला हमारे मकान मालिक और उनका वो बेटा जो गुस्सा होने पर ख़ुद को ही पीटता थाउनका वो सीमेंट का गोदाम जिसमे छिप कर हम लोग आइस पाइस खेला करते थेदो कमरे , एक रसोईं और बीच का वो आँगन जिसमे मम्मी की सूखने को डाली गयी साडी हमने जमादारिन को दे डाली थीऔर उसके बाद का नज़ारा तो भूलना ही मुश्किल है माताजी की डांट , सच क्या मीठे दिन थे वोऔर उन दिनों में एक बार जब सामने रहने वाले बच्चों से जब हम गाली सीख आए थे और पापा के उपर ही आजमाँ डाली थी तो कितना पिटे थेपापा की वो पहली और आखिरी मार थी पर आज भी उनकी उँगलियों के निशान गाल पर महसूस होते हैंवो घर के पास वाला पार्क जिसमे बीच में एक फ़वारा हुआ करता थावो स्कूल जिसके प्रिंसिपल से डर कर हम लोग अपने रुमाल से जूते पोछा करते थेवो दिन लौट तो नही सकते पर हाँ उनकी यादों को संजों कर रखा जा सकता है

सही ही है: " ये दौलत भी ले लो , ये शौहरत भी ले लो ,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी,
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज़ की कश्ती , वो बारिश का पानी । "